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सोमवार, 27 जुलाई 2020

जनता और सरकार के बीच पारदर्शिता स्थापित करने का सशक्त माध्यम है मीडिया

मीडिया यानी जनसंचार का माध्यम। जनसंचार का सामान्य अर्थ होता है किसी सूचना या संदेश को एक व्यक्ति से समूह तक पहुंचाना । उन्नीसवीं सदी के पूर्वार्ध में जब ग़ुलामी की ज़ंजीरों से हमारा देश बंधा हुआ था। अपनी ही चीजों के लिए हमें अंग्रेज़ों के सामने झुकना पड़ता था, उनके कई ज़ुल्म सहने पड़ते थे । आज के युग में मीडिया की ताकत कितनी है, इस बात का अंदाज़ा उसी घटना से लगाया जा सकता है जिसने पूरे यूरोप में राष्ट्रवाद की भावना को जागृत किया और पूरे यूरोप महादेश को राजतंत्र से मुक्त करा दिया। बस फिर वही विचारधारा हर जगह पत्रिकाओं में छपने लगे और इसी तरह वो समाज के निम्न वर्ग तक पहुंचा । जब ये समाज में निम्न वर्ग तक पहुंचा तो लोगों के बीच वाद-विवाद की संस्कृति जन्मी, जिसने लोगों को ये सोचने पर मजबूर किया कि क्रांतिकारी होता क्या है, अत्याचार क्या है और किसी का बहिष्कार कैसे किया जाता है । अगर देखा जाए तो भारत में स्वतंत्रता कि नींव तो तभी रखी जा चुकी थी जब लोगों की दिलचस्पी जनसंचार माध्यमों में बढ़ने लगी थी ।

Media story

मीडिया के ज़रिए भारत में कई स्वतंत्रता सेनानियों ने अपनी आवाज़ बुलंद की और लग गए स्वतंत्रता संग्राम की होड़ में, चाहे वो 'बापू' का समाचार-पत्र 'यंग इंडिया' हो या फिर 'इंडियन ओपिनियन’ । लोग ज्यादा से ज्यादा पढ़ने लगे और उस से भी कहीं ज्यादा सवाल खड़े करने लगें ।

मीडिया न केवल जन संचार का माध्यम बन लोंगो तक पहुँचा अपितु इसने हर वर्ग के लोगों को एक सुनिश्चित अवाज़ दे कर उस वर्ग को सशक्त किया। मीडिया ने हमें ये समझाया कि जब धरती हमारी है, धरोहर हमारे हैं, तब भला उन्हीं के लिए हम दूसरों की गुलामी क्यों करें ? जब ऐसे ही सवाल सभी के मन में कौंध उठे तब हमारे देश के अलग-अलग हिस्सों से आज़ादी की खुशबू चारों ओर बिखरने लगी और आखिरकार,15 अगस्त 1947 को हम तमाम बेड़ियों से आज़ाद हो उठ खड़े हुए । मीडिया ने यकीनन स्वतंत्रता संग्राम में अहम भूमिका निभाया और देश को विकास का नया मार्ग दिया।

Media for common people

समाज एक तरह की सोच रखने वालों से तो नहीं बना है । समाज का अर्थ ही होता है एक से अधिक लोगों के समुदायों से मिलकर बना एक बड़ा समूह। मीडिया कई अलग परिप्रेक्ष्य के लोगों में एक विचार को प्रबल कर के सामाजिक एकता का विकास करने की अपनी क्षमता को भी दर्शाता है।

जैसा कि हम सभी जानते हैं समाज में बहुत-सी बुराइयां भी हैं । सोशल मीडिया सामाजिक बुराईयों से लड़ने में हमारा हथियार बनता है । चाहे वो करप्शन हो या फिर दहेज-प्रथा । पिछले ही साल एल.जी.बी.टी कम्यूनिटी बिहार ने अपने सम्मान के लिए आवाज़ उठाते हुए पाँच सौ मीटर का 'प्राइड परेड' कराया जो कि 'गिनीज़ व‌र्ल्ड रिकार्ड्स' में दर्ज भी हुआ । मीडिया के जरिए ही यह कम्यूनिटी लोगों तक पहुंची, उन्हें समझाया कि हम भी बिल्कुल आपके जैसे हैं। फिर हमें क्यों हीन भावना से देखा जाता है और ऐसे ही उन लोगों को काफी सपोर्ट मिला और महज़ एक साल में उन्होंने सोशल मीडिया पर अपना एक परिवार बना लिया । ठीक ऐसे ही हम भी क्षण भर में अपनी बात लाखों, करोड़ों लोगों तक पहुंचा सकते हैं और कई बार हमारे समस्याओं का निदान भी निकल आता है।

'थॉमस कार्लाइल' ने भी कहा है -
"मीडिया लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ है" । मीडिया सरकार और जनता के बीच पुल का काम करती है और जनता को पल-पल की खबर से अवगत कराती है । अगर मीडिया न हो तो सरकार और जनता के बीच पारदर्शिता संभव है क्या ?

लोगों की हर परेशानी को,उनके कष्ट को सरकार के सामने कौन लाता है? बाढ़ से अभी बिहार और अन्य कई राज्यों की जो स्थिति बनी हुई है, उससे लोगों को जो परेशानी हो रही है, वो सरकार के सामने कौन लाता है ? कौन उठाता है सवाल कि सड़कों की मरम्मत होनी चाहिए ? जब परेशानियां सामने आएंगी, तभी तो उनका हल निकलेगा और एकसमान स्तर पर सबका विकास होगा ।

मीडिया कभी टीवी पर फिल्मों के माध्यम से तो कभी रेडियो पर ड्रामा के माध्यम से समाज की बुराइयों को दूर करने के लिए हमें प्रेरित करता आया है। घर में बैठी महिलाओं को भी बातें खटकने लगी कि आखिर भेदभाव क्यों ? समाज तो पुरूष और औरत दोनों ही से मिल कर बना है फिर ऊंच-नीच क्यों ?

मीडिया विश्वस्तर पर भी हमारा प्रचार करता है। दूसरे देश के लोग जनसंचार माध्यमों से ही तो हमारी संसकृति, हमारे यहाँ के धार्मिक और पर्यटन स्थलों के बारे में जान पाते है । अगर मीडिया न होता तो क्या हम दूसरे देशों का हाल जान पाते ? वहां की संस्कृति को समझ पाते? मीडिया की वजह से ही दो देश आपस में अपने संस्कृति को बाँट पाते हैं और एक-दूसरे की संस्कृति को समझ भी पाते हैं, जो कि विश्वस्तर पर व्यापार, कूटनीतिक सहयोग, विश्वशांती और समग्र विकास करने में हमारी सहायता करता है ।

Indian media

कन्या उत्थान योजना, मातृत्व वंदना योजना, आयुष्मान भारत योजना जैसी अन्य बहुत सारी योजनाएं हैं जो सरकार समाज के विकास के लिए घोषित करती है। तो क्या सिर्फ घोषणा कर देने से उन योजनाओं का लाभ '1 अरब 38 करोड़' आबादी तक पहुंच जाएगा ? क्या सभी लोग सही तरीके से समझ पाएंगे कि उनसे उनको क्या लाभ होगा ? बिल्कुल नहीं, उन योजनाओं को हर वर्ग के लोगों तक पहुंचाने कि जरूरत को मीडिया ही तो पूरी करता है। हाल ही में मैंने अखबार में पढ़ा कि लाॅकडाउन में मानसिक तनाव व अवसाद की स्थिति उतपन्न होने पर हम ऑनलाइन काउन्सलर से सलाह ले सकते हैं । इसके लिए 'यूनिसेफ' व 'राष्ट्रीय सेवा योजना' ने हमारे लिए काउन्सलर की सुविधाएं दी हैं । इसकी खबर भी तो हमें मीडिया से ही मिली न?

मौजूदा परिदृश्य ही देख लीजिए पूरा विश्व कोरोना महामारी की चपेट में है और स्थिति ऐसी है जहाँ बाहर निकलना मतलब महामारी का शिकार बनना है । ऐसे में घर बैठे हमें हर क्षण की ख़बर है चाहे वो सरकारी नीतियां हों, आवश्यक सूचनाएँ या फिर कल्याणकारी योजनाएं हों । इन सबका प्रचार-प्रसार मीडिया से ही तो संभव है । ऐसी स्थिति में हमें कैसे एहतियात बरतना है से ले कर कैसे इस महामारी से लड़ना है, सबकुछ मीडिया ही तो सिखा रहा है। मीडिया मानो तरह-तरह के माध्यमों से हमारा हौसला बढ़ा रहा है। ज़रा सोचिए जीवन ही नहीं बचेगा, फिर विकसित समाज और देश बनाना संभव है क्या?

Radio house

वो मीडिया ही है जिसके कारण नई पीढ़ी इतिहास को जान पाती है । मीडिया गरीब और अमीर दोनों को एक ही तवज्जो देता है। मीडिया ही आवाज़ बना कभी अवाम की, तो कभी पूरे हिदुस्तान की, मीडिया मिसाल है इस बात की, कि चाहे कैसे भी हालात हों, वो हमेशा समाज के विकास के कार्यो में जुटा रहेगा । अगर मीडिया तटस्थ और संतुलित रही तब वो दिन दूर नहीं जब हम समाज की तमाम कुरीतियों पर विजय प्राप्त कर लेंगे और हमारे देश का नाम भी विकसित देशों में गिना जाएगा ।

" चलो मीडिया को हथियार बनाएं,
जनता और सरकार के बीच पारदर्शिता बढ़ाएं।
हर वर्ग को उनका अधिकार दिलाएं,
मिलकर भारत को एक विकसित राष्ट्र बनाएं। "

✍️ शालिनी 

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