फिल्म रिव्यू: समाज में महिलाओं की इच्छाओं और उनके स्वतंत्रता पे लगी बंदिशों से काफी हद तक रूबरू करवाती है फिल्म डॉली किट्टी और वो चमकते सितारे - Bihari karezza - Khabre Bihar Ki

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शनिवार, 19 सितंबर 2020

फिल्म रिव्यू: समाज में महिलाओं की इच्छाओं और उनके स्वतंत्रता पे लगी बंदिशों से काफी हद तक रूबरू करवाती है फिल्म डॉली किट्टी और वो चमकते सितारे

फिल्म डॉली किट्टी और वो चमकते सितारे नेटफ्लिक्स पे बीते शुक्रवार को रिलीज की गई। इसे डायरेक्ट किया गया है। अलंकृता श्रीवास्तव ने इससे पहले उन्होंने प्रकाश झा की फिल्म 'टर्निंग 30 और लिपिस्टिक अंडर माई बुरका' जैसी महिला केंद्रित फिल्मों में बतौर निर्देशक काम किया है। इस बार भी वह इस फिल्म को महिलाओं के इर्द-गिर्द घुमाती नजर आईं हैं।


Dolly kitti and vo chamkte sitaare image


फिल्म की कहानी दो चचेरी बहनें डॉली और किट्टी की है जो एक मिडिल क्लास फैमिली से आती है। डॉली (कोंकणा सेन शर्मा) जो नोएडा में अपने पति (भावना बशीर) और दो बच्चों के साथ रहती हैं जो अपने शादीशुदा जीवन से संतुष्ट नहीं रहते हैं। और उसे डिलीवरी बॉय उस्मान (अमोल पराशर) जो एमबीए का स्टूडेंट है उसमें डॉली अपना हमसफर ढूंढने लगती है। दूसरी ओर किट्टी उर्फ ​​काजल (भूमि पेडनेकर) जो बिहार के दरभंगा में ठीक हुई शादी को ठुकरा कर  नोएडा आ जाती है। और अपने जीवन को स्वतंत्र रूप से जीना चाहती है। उसे कठिनाई होती है। फिर वो एक डेटिंग एप कंपनी में काम करने लगती है। वह वहाँ किट्टी बनकर लोगों से प्यार भरी बातें करती है और उसी में एक कस्टमर प्रदीप (विक्रांत मेसी) से प्यार हो जाता है। उधर डॉली का पति अमित उस डेटिंग कंपनी में कॉल करता है और इत्तेफाक से उसकी बात किट्टी से होती है। इसकी जानकारी वो डॉली को देती है। 

रिव्यु

फ़िल्म में भूमि पेडनेकर और कोकणा सेन शर्मा का अभिनय उत्कृष्ट रहा है। भूमि पेडनेकर को इससे पहले हम पति पत्नी और वो, सुभ मंगल सावधान जैसे फिल्मो में इस तरह के किरदार निभाते देख चुके हैं। किट्टी के प्रेमी के रूप में विक्रांत मेसी ने अच्छा काम किया है इनके अलावा अमीर बशीर और अमोल पराशर का अभिनय भी सहज रहा है। विक्रांत मेसी को स्क्रीन टाइम ज्यादा नहीं मिला है। उनकी स्क्रीन टाइमिंग को थोड़ा और बढ़ाया जा सकता था। अलंकृता श्रीवास्तव की पिछली फिल्म लिपिस्टिक अंडर माई बुर्का के मुकाबले इसकी लेखनी थोड़ी हल्की रही है। मगर उनकी एक बात की तारीफ करनी होगी की ये फिल्म भले ही महिला प्रधान हो मगर इसमें पुरुषों को क्रूरता या खलनायक के रूप में नहीं दिखया गया है। इसके बावजूद ये फिल्म अपनी बात काफी सहजता से रखती है। इस फिल्म के शुरुआत में दरभंगा की भाषा के कुछ शब्दों को लिया गया है लेकिन इतने अल्प शब्द कैरेक्टर को दरभंगा वाले माहौल में पूरी तरह ढलने से रोक लेती है। संवादों में दरभंगा के भाषा और उसके लहजे का थोड़ा और इस्तेमाल करने आवश्यकता थी। कुछ समय के उपरांत फिल्म की कहानी कैरेक्टरों के योन की असंतुष्टि की ख्वाहिशों पे ठहर जाती है। इसके बावजूद इसे काफी साफ और सहज रखने की कोशिश की गई है।

🖋️ सूर्यकांत शर्मा

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