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शुक्रवार, 2 अक्तूबर 2020

फिल्म रिव्यु: बच्चों पे माता-पिता के महत्वकांक्षाओं के बढ़ते बोझ को दिखाती फिल्म 'सीरियस मैन'

 हर माँ-बाप अपने बच्चे को खुद से बेहतर बनाना चाहते हैं। और अपने ख्वाहिशों को उन पर थोपते हैं लेकिन शायद वे भूल जाते हैं। बच्चे की उम्र इन ख्वाहिशों का बोझ ले पायेगा भी या नहीं। सुधीर मिश्रा ने कुछ इसी तरह की कहानी पे फिल्म 'सीरियस मैन' बनाई है। यह फिल्म मनु जोसेफ की नॉवेल 'सीरियस मैन' पे आधारित है। ये फिल्म उन माँ-बापों पे सवाल उठाती है जो अपने बच्चे को शुरू से जीनियस बनाने में इस कदर डूब जाते हैं कि उन्हें अपने बच्चे का बचपन नज़र ही नहीं आता। यह फिल्म हमारी शिक्षा प्रणाली पे भी सवाल उठाती है। इससे पहले भी कुछ इसी तरह की फिल्म परीक्षा और हिंदी मीडियम जैसी फिल्में दर्शकों के सामने आ चुकी हैं।



व्यक्ति व्यक्ति नवाजुद्दीन सिद्दीकी


इस फिल्म की कहानी शुरू होती है एक दलित व्यक्ति अय्यन मणि (नवाजुद्दीन सिद्दीकी) जो अपनी पत्नी इंदिरा तिवारी और बेटे आदि (अक्षत दास) के साथ मुंबई में किराए पर रहता है। जो नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च सेंटर में डॉ। आचार्य (शेकर) का पये है। लेकिन वे डॉ आचार्य के व्यवहार से परेशान रहता हैं। वह अपने बेटे को डॉ आचार्य के स्कूल में एडमिशन के लिए ले जाता है। लेकिन उसका वहाँ एडमिशन नहीं होता क्योंकि वह अपने बेटे को जीनियस बनाने की ठानता है। वह अपने बेटे आदि को एग्जाम के पेपर पहले ही मंगवा लेता है। और वह उसे ब्लूथुथ स्पीकर के माध्यम से पूरे सवाल का जवाब बताता है। पॉलिटिशियन संजय नार्वेकर और स्वेता बसु प्रसाद भी उसका उपयोग अपनी राजनीति के लिए करते हैं लेकिन एक वक्त के बाद आदि इतना जोर लेने में असमर्थ हो जाता है और सबको उसकी सच्चाई के बारे में पता चल जाता है। और अय्यन को बाद में अपने किए पे पछतावा होता है। इसमें एक दलित होने की कसक भी है जो अय्यन को उठानी पड़ती है।

रिव्यु

नवाजुद्दीन सिद्दीकी इस तरह के किरदार के आदि हो चुके हैं। उन्होंने अपने किरदार को संजीदगी से निभाया है। इंदिरा तिवारी भी पूरी तरह से निम्न वर्ग के महिला का आभास करवाती हैं। और अक्षत दास सहित सभी कलाकारों ने अपने प्रदर्शन से प्रभावित किया है। सुधीर मिश्रा का डायरेक्शन अच्छा रहा है उनकी क्रिएटिविटी का कमाल हमने चमेली, खोया-खोया चांद जैसी फिल्मों में देख चुके हैं। सिनेमाटोग्राफी भी अच्छी रही है निम्न वर्ग के रहन सहन को खूबसूरती से दिखाया गया है। पटकथा भी सही रही है। लेकिन कुछ जगहों पे फिल्म अपना संदेश खोती हुई नजर आती है। इसकी एक वजह ये भी है कि फिल्म में कई मुद्दों को एक साथ उठाने की कोशिश की गई है। फिल्म में कुछ जगह अपशब्द संवादो का उपयोग किया गया है जो बच्चों को फिल्म से दूर रहने का कारण बन सकता है। 

यह फिल्म उतनी प्रभावशाली नहीं है। जितना आप इसके विषय को सुनकर उत्सुक होंगे। लेकिन एक बार देखने में कोई समस्या नहीं है।


✍️✍️  सूर्याकांत शर्मा   ✍️✍️



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