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सोमवार, 8 मार्च 2021

भारत में महिलाओं की वास्तविकता

भारत के जनसंख्या में 48% महिलाएं और 52% पुरुष है। यहाँ भी महिलाओं को पुरुषों के तुलना में समान दर्जा दिया गया है. परन्तु फिर भी महिला को आज भी दूसरा विकल्प रखते है लोग आज भी कही न कही उनपे दबाव डाला जाता है, उन्हें कमजोर समझा जाता है. भगवान ने सभी को बराबर बनाया है, कौन कार चला सकता कौन प्लेन उड़ा सकता कौन घर से बाहर निकल सकता ये भगवान ने बना कर नहीं भेजा था।  



5 लाख लड़कियों को हमलोग हर साल मार देते है। क्योंकि भारत के अंदर हर किसी के पास साम्राज्य ज्यादा है. हर किसी को अपने वंश को चलाने के लिए एक लड़के की जरूरत होती है. जो इंसान बीड़ी भी उधार लेकर पी रहा हो, उसे भी अपने साम्राज्य को चलाने के लिए एक वंशज की जरूरत होती है. रही बात शिक्षा की तो अगर माँ बाप के पास किसी एक को पढ़ाने की क्षमता हो, तो वो लड़के को पढनाएँगे भले ही लड़की पढ़ने में बहुत अच्छी ही क्यों ना हो. हमारे समाज में लड़कियां को 5% दहेज के साथ विदा कर दिया जाता है, 95% पर राजा बेटा कुल का दीपक राज करता है. अगर गलती से कोई लड़की अपने कमाए पैसे से घर खरीद ले और उसे अपने माँ बाप को तोहपे में दे तो उसे भी लड़का का श्रेय दे देते हैं, कि तू तो कोई बेटा से कम नहीं, तू तो मेरी लड़की नही लड़का है। एक लड़की ने भले ही पीएचडी कर रखी हो पर उसको बाहर जाना है तो साथ में कोई लड़का जरूर होना चाहिए चाहे वो लड़का 5 साल का बच्चा ही क्यों ना हो मगर उस लड़की को अकेले जाने नहीं दिया जाएगा. हमलोग बहुत खुश हो जाते है कि हमलोग चाँद तक पहुँच गए, लेकिन क्या फायदा उस चीज का जब 6 बजे के बाद लड़कियां कर्फ्यू में चली जाती है. Right to freedom, Right to equality की धज्जियाँ उड़ जाती है। 

पूरी दुनिया में एक महिला, पुरूष के तुलना में दुगुना काम करती है. फिर भी 99% न्यायाधीश पुरूष है, 90% सैलरी लड़के को मिलती है, संसद में 80% सीट पर पुरुष बैठे है, पूरी दुनिया में 80% प्रोपटी के पुरूष मालिक है। हमारे देश में 3 में से 1 महिला घरेलू हिंसा की शिकार होती है. जैसे  शारीरिक रूप से, मानसिक रूप से, आर्थिक रूप से आदि इसके वजह से महिलाओं को कमजोर समझ उसपे अपना हुक्म जता कर उसे नियंत्रण करने लगते है. किसी भी विकसित देश में औरत और मर्द को समान दर्जा दिया जाता है. इसलिए वह प्रगतिशील विकसित होता है। जब हम आजाद नहीं थे ब्रिटिश के अंतर्गत थे वह हमपे अपना हुक्म जताते थे क्या कुछ नहीं करवाते थे ठीक उसी प्रकार आज भी 48% आबादी के साथ वही हो रहा है, जो ब्रिटिश शासन में तमाम लोगों पे हुआ करता था। 

शादी के उम्र हो जाने पर भी लड़कियां को बहुत कुछ सहना पड़ता है, बहुत कुछ करना पड़ता है. भले ही लड़कियां कितनी भी पढ़ी लिखी क्यों ना हो, अगर उसमें थोड़ी सी भी कमियां है तो उसे बोला जाता है ऐसे करो वैसे करो, वरना शादी में दिक्कतें होंगी रुकावटें आएंगी मोटी हो तो थोड़ी पतली होने की कोशिश करो, काली हो थोड़ी गोरी हो जाओ, नाटी हो थोड़ी लम्बी होने का प्रयास करो अरे खाना बनाने नहीं आता ये तो एक महिला का काम हैं फर्ज है कर्तव्य है जैसे मानो कि एक औरत के लिए धर्म हो ये चीज और ना जाने क्या क्या, एक लड़की जब किसी की सुनती है तो सभ्य है समाज के नजर में बहुत ही अच्छी लड़की है और जब वह अपनी हक के लिए आवाज उठाए तो उसे लोग ना जाने क्या क्या चीज का दर्जा दे देते है. एक लड़की की सारी उम्र यही सोचने में गुजर जाती है कि उसका अपना घर है तो है कौन सा क्योंकि उसे शुरू से ये सुनने को मिलता है कि मायके में उन्हें पराए घर जाना है और ससुराल में वह पराए घर से आयी है, अरे बेटियां तो पराई होती है पराई धन होती है. तो वास्तविक घर कौन सा है यह तो एक रहस्य बन कर रह गया है।

आपको लग रहा होगा कि ये जितने भी कुछ हुए हैं या फिर हो रहे है. इन सबका जिम्मेदार लड़का है पर नहीं यह एक समाज की सोच है. इनकी बनावटी विचारधारा है. और इस सोच को मानने वालें लड़के भी हैं और इस सोच के खिलाफ लड़ने वालें भी लड़के हैं।


✍️पूजा गुप्ता✍️


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